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गरीबों को आर्थिक आधार पर जारी रहेगा आरक्षण, EWS कोटे पर SC ने लगाई 3-2 से मुहर

By Vinod Kumar -- November 7th 2022 01:57 PM
गरीबों को आर्थिक आधार पर जारी रहेगा आरक्षण, EWS कोटे पर SC ने लगाई 3-2 से मुहर

SC On EWS Reservation: सुप्रीम कोर्ट ने EWS (आर्थिक रूप से कमजोर सामान्य वर्ग) के लोगों को 10 फीसदी आरक्षण को सही करार दिया है। कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने 10% EWS कोटा को सही ठहराया है। पांच जजों की बेंच में तीन जजों ने पक्ष और दो ने इसके विपक्ष में फैसला सुनाया था। 

जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पारदीवाला ने 10 फीसदी आरक्षण का समर्थन किया है। वहीं, चीफ जस्टिस यूयू ललित और जस्टिस रविंद्र भट ने इस पर असहमति जताई है। 

सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने फैसला सुनाते हुए कहा कि ईडब्ल्यूएस आरक्षण सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए 50 प्रतिशत कोटा को किसी भी रूप में बाधित नहीं करता है। कोर्ट ने कहा कि गरीब सवर्णों को समाज में बराबरी तक लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई के रूप में संशोधन की आवश्यकता थी।

जस्टिस माहेश्वरी ने कहा कि आर्थिक आरक्षण संविधान के मौलिक ढांचे के खिलाफ नहीं है। 103वां संशोधन वैध है। जस्टिस बेला त्रिवेदी ने भी इस फैसले पर सहमति जताई है। उन्होंने कहा कि मैं जस्टिस माहेश्वरी के निष्कर्ष से सहमत हूं। एससी/एसटी/ओबीसी को पहले से आरक्षण मिला हुआ है। उसे सामान्य वर्ग के साथ शामिल नहीं किया जा सकता है। संविधान निर्माताओं ने आरक्षण सीमित समय के लिए रखने की बात कही थी, लेकिन 75 साल बाद भी यह जारी है।

जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि बहुमत के विचारों से सहमत होकर और संशोधन की वैधता को बरकरार रखते हुए कहा कि, आरक्षण आर्थिक न्याय को सुरक्षित करने का एक साधन है और इसमें निहित स्वार्थ की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। इस कारण को मिटाने की यह कवायद आजादी के बाद शुरू हुई और अब भी जारी है।

जस्टिस रवींद्र भट ने ईडब्ल्यूएस आरक्षण पर कहा कि संविधान सामाजिक न्याय के साथ छेड़छाड़ की अनुमति नहीं देता है। इस तरह का आरक्षण भारतीय संविधान के आधारभूत ढांचा के तहत उपयुक्‍त नहीं है। चीफ जस्टिस यूयू ललित ने ईडब्ल्यूएस कोटे के खिलाफ अपनी राय रखी है। उन्होंने कहा कि वह जस्टिस भट के निर्णय के साथ हैं। 

2019 में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले केंद्र सरकार से पहले EWS आरक्षण को लागू किया था। इसके खिलाफ तमिलनाडु की सत्तारूढ़ पार्टी डीएमके समेत कई याचिकाकर्ताओं ने इसे संविधान के खिलाफ बताते हुए अदालत में चुनौती दी थी। याचिकाकर्ताओं ने दलील है कि आरक्षण का मकसद सामाजिक भेदभाव झेलने वाले वर्ग का उत्थान था, अगर गरीबी आधार तो उसमें एससी-एसटी-ओबीसी को भी जगह मिले।ईडब्लूएस कोटा के खिलाफ दलील देते हुए कहा गया कि ये 50 फीसदी आरक्षण की सीमा का उल्लंघन है।

इसके बाद 2022 में संविधान पीठ का गठन हुआ और 13 सिंतबर को चीफ जस्टिस यूयू ललित, जस्टिस दिनेश महेश्वरी, जस्टिस रवींद्र भट्ट, जस्टिस बेला एम त्रिवेदी और जस्टिस जेबी पादरीवाला की संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की थी। 

 



 


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