हरियाणा

सुप्रीम कोर्ट का बढ़ा फैसला, कोविड से हुई मौतों पर मुआवजे के लिए नियुक्त किए जाएं नोडल अधिकारी

By Vinod Kumar -- February 04, 2022 4:40 pm -- Updated:February 04, 2022 5:45 pm

सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) द्वारा देश में कोरोना के कारण हुई मौतों के मुआवजे पर एक ही महत्वपूर्ण निर्देश दिया गया हैं। सुप्रीम कोर्ट ने देश के सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को अंडर सेक्रेटरी या इससे ऊपर के दर्जे के अधिकारी को नोडल अधिकारी नियुक्त करने को कहा है ताकि कोविड-19 पीड़ितों के परीजनों तक मुआवजे की राशि का भुगतान सुनिश्चित किया जा सके। सूचना के तहत नोडल अधिकारी राज्य विधिक सेवा प्राधिकरण (एसएलएसए) के साथ मिलकर पीड़ितों तक मुआवजा पहुंचाने का काम करेंगे।

इसके अलावा राज्य से लेकर तालुका स्तर पर कार्यरत विधिक सेवा प्राधिकरण भी इस कार्य में पीड़ित आवेदक व सही हकदारों की पहचान और तस्दीक करने में मदद करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने ये भी कहा है कि अगर मुआवजे की अर्जियों में कोई भूल, गलती या कुछ कमी हो तो उसे रद्द ना करें। रद्द करने की बजाय उसमें समय जाया किए बिना समुचित सुधार कराया जाए, क्योंकि कल्याणकारी राज्य का अंतिम लक्ष्य पीड़ितों को कुछ सांत्वना और मुआवजा प्रदान करना होता है।

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कोर्ट ने कहा कि राज्यों को दावा प्राप्त होने के 10 दिन की अधिकतम अवधि के भीतर पीड़ितों को मुआवजे का भुगतान करने के लिए सभी प्रयास करने चाहिए। कोर्ट ने अपने पहले के आदेश में कहा था कि राज्य सरकारें अपने पोर्टल पर दर्ज covid-19 से संबंधित मौतों का पूरा ब्योरा देने के साथ ही उन व्यक्तियों का पूर्ण विवरण दें जिन्हें अनुग्रह राशि का भुगतान किया जा चुका है, लेकिन इसके बावजूद ऐसा प्रतीत होता है कि अधिकतर राज्यों ने केवल आंकड़े दिए हैं और कोई पूर्ण विवरण नहीं दिया है।

हमारे आदेश के पीछे भावना ये थी कि कोविड की वजह से मारे गए लोगों के आश्रित अगर किसी भी वजह से प्राधिकरण तक नहीं पहुंच पा रहे हैं उनको रास्ता दिखाना या फिर सीधे तौर पर उनकी मदद करना। राज्यों ने अपने हलफनामे में ये भी नहीं बताया कि इस महामारी की वजह से कितने यतीम हुए? राज्य हमें इन सारी बातों की विस्तृत जानकारी चार्ट के जरिए एक हफ्ते में दें। इसमें कोई लापरवाही नहीं होनी चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार की इस नीति की आलोचना करते हुए कहा कि सिर्फ ऑनलाइन अर्जियां देने का प्रावधान कतई व्यवहारिक नहीं है। आप पीड़ितों की ऑफलाइन अर्जियां खारिज कैसे कर सकते हैं? क्या आपको लगता है कि सुदूर गांवों में रहने वाले गरीब, कम पढ़े लिखे आदमी ऑनलाइन अर्जी देंगे?

 

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